Monday, 15 April 2019

बच्चों का स्कूल चुनने जा रहे हैं... तो स्कूल चुनिए दुकान नहीं, उसे चुनिए जो उनकी जीत-हार, दोनों की जिम्मेदारी ले... और ऐसा कोई स्कूल है ही नहीं.


जरा इन दिनों अखबार में आ रहे स्कूलों के विज्ञापन और Pamphlets पर गौर कीजिए। Toppers की Photos से भरे पड़े हैं। लेकिन कोई उनकी तस्वीर नहीं लगाता जो Pass या Top नहीं कर पाया। क्या वो इस स्कूल में नहीं पढ़ रहे थे। ऐसा क्यों? स्कूलों का बड़ा सीधा सा जवाब है - हर बच्चा एक जितनी मेहनत नहीं करता। हम तो सब पर मेहनत करते हैं। 
Dear School Owners... Please बताइए. अगर Toppers के Top करने का सारा Credit आपको है, तो जो पास नहीं हुए, उनकी जिम्मेदारी कौन लेगा? 

दोस्तों April आ गया है। यानी बच्चों के स्कूल चुनने या यही स्कूल Continue करना है या नहीं, यह फैसला लेने का महीना। घरों में इन दिनों कुरुक्षेत्र की रणभूमि से ज्यादा रणनीतियां बन रही हैं। स्कूलों के चुनाव के लिए तरह-तरह के Arguments, Pleas दिए जा रहे हैं। दोस्तों, रिश्तेदारों से सलाह ली जा रही है। सबसे महंगे, बड़े या Reputed स्कूलों की लिस्टें बन रही हैं। वगैरहा-वगैरहा।

हम क्या देखते हैं, एक बच्चे का स्कूल चुनते समय-

अगर एक साधारण Middle Class Family की बात करें तो बच्चे का Best School चुनने के Search Critarias बहुत अजीब होते हैं। हम बहुत सारे Filters तो बनाते हैं लेकिन वे इतने बेमानी होते हैं कि कभी पूरे ही नहीं हो पाते। आइए गौर करें हमारे कुछ फेवरेट Parameters पर -

1. बहुत ही Reputed School है। CM से सिफारिश कराई, तब जाकर Admission हो रहा है।
2. डेढ़ लाख रुपए साल की फीस है। Teachers English में ही बात करते हैं।
3. Co Curricular Activities बहुत हैं। बच्चा हमेशा कुछ नया करता रहता है।
4. उनका बच्चा भी वहीं पढ़ता था। आज देखो, कैसी फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता है।
5. Home Work बहुत कम है। जो देते हैं, वो भी स्कूल में ही करा देते हैं। Blah Blah....

और स्कूल असल में दुकान बन गए हैं...


जरा गौर से अपने बच्चे को देखिए। और अपने आप से पूछिए- हमारी प्राथमिकता Priorties क्या हैं?  हम बच्चे के लिए स्कूल चुन रहे हैं या स्कूल के लिए एक ग्राहक। एक स्कूल आपके बच्चे की 360 डिग्री Development में कोई बहुत बड़ा Role अदा कर सकता है, यह एक झूठ है। इसके कई कारण भी हैं।

पहला और सबसे बड़ा कारण - माफी के साथ लिखना पड़ रहा है कि ज्यादातर स्कूल दुकानों में तब्दील हो चुके हैं। यहां Education दी नहीं, बेची जाती है। किसी को आपके बच्चे की नहीं पड़ी। उन्हें सिर्फ अपनी दुकान चलानी है। इसके लिए उन्हें हर साल कुछ ऐसे झंडे गाड़ने होते हैं, जिनके सहारे वे अगले साल और ज्यादा बच्चों को आकर्षित कर सकें।

इसीलिए स्कूलों का Target Fix रहता है। पहले से पढ़ाई में होशियार बच्चे चुनिए। वे अच्छे रिजल्ट ले आएंगे। कुछ Sports और Games के बच्चे चुन लीजिए। साल के अंत में पोस्टर बनाने में काम आएंगे।

स्कूल मैनेजमेंट का ज्यादातर ध्यान उस सारे कमीशन पर रहता है जो उसे एक बच्चे के जरिए मिलता है। स्कूल की किताबें (जो स्कूल के दावे के बाद भी लाख कोशिश करने पर भी कहीं और नहीं मिलतीं), यूनिफॉर्म, ट्रांसपोर्ट, कैंटीन, स्मार्ट क्लास आदि-आदि। सबमें स्कूल का कमीशन फिक्स रहता है। बहुत कम स्कूल इस फेर से बचे हुए हैं। 

दूसरा बड़ा कारण - जब हम इस सोच के साथ स्कूल चुनते हैं कि बच्चे की पूरी पढ़ाई और Development का जिम्मा तो स्कूल का है, तो हम दो गलतियां करते हैं -

पहली : हम अपनी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका से किनारा कर लेते हैं और सारा कुछ स्कूल के माथे मढ़ देते हैं। असल में बच्चे की स्कूल से कहीं ज्यादा Grooming और Development घर पर होती है। आप खुद ही सोचिए। आपके अधिकतम दो बच्चे और उनका आपसे करीब 18 घंटे का साथ। स्कूल में बच्चा 6-8 घंटे रहता है। एक टीचर के पास करीब 30 बच्चे वो भी अधिकतम आधे घंटे के लिए। ऐसे में स्कूल कैसे किसी बच्चे के साथ वो कनेक्शन बना सकता है, जैसा आपका होता है।

दूसरी : जैसे ही हम बामुश्किल, जोड़-तोड़-सिफारिश करके बच्चे का किसी So Called Reputed School में दाखिला कराते हैं तो वो हमें और बच्चे को Drive करना शुरू कर देता है। फिर बच्चा आपके नहीं, स्कूल के हिसाब से चलता है। और आप कुछ कह भी नहीं सकते। क्योंकि स्कूल ने तो एडमिशन देकर आपपर और आपके बच्चे पर अहसान किया है।

स्कूलों के बारे में और बहुत कुछ... अगली पोस्ट में।


Friday, 5 April 2019

दुनिया के आधे से ज्यादा बच्चों की जिंदगी केवल एक शब्द ने खराब कर दी है...वो है तुलना

The comparison is the Thief of Joy
                                                           - Theodore Roosevelt

हमारा सबसे बड़ा अपमान है हमारी तुलना किए जाना। वो भी किसी ऐसे व्यक्ति के साथ, जिसका हमारे चरित्र निर्माण में कोई योगदान नहीं है। और बच्चों का दुर्भाग्य देखिए कि उन्हें सबसे ज्यादा सहन करना पड़ता है तुलना को।

अगर गौर करें तो तुलना ही हमारा वो ब्रह्मास्त्र बन गया है जिसके सामने हम बच्चों को हमेशा हारा हुआ, निसहाय और पस्त पाते हैं।



तुलना, तीसरा सबसे बड़ा Pressure है जो Parents अपने बच्चों पर उपयोग करते हैं। पहले दो यानी - सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग और  क्या कमाएगा? नौकरी कैसे मिलेगी? जिंदगी भर क्या करेगा? के बारे में हमने पिछली पोस्ट में बात की।

जरा देखिए कि हमारी तुलना क्या, कैसी और कितनी निर्रथक होती है। हमारी तुलना में कोई Logic, Sense या Scientific Fact नहीं होता। होती है तो बस एक कोशिश। किसी तरह शर्माजी के लड़के, गुप्ताजी की लड़की या वर्माजी के भतीजे का उदाहरण देकर अपने बच्चों को कमतर बताने की कोशिश।

उसने तो 12वीं करते ही IIT की तैयारी कर ली थी। पूरे पूरे दिन घर में बंद रहकर पढ़ाई करता रहा। आज देखो। कितनी अच्छी नौकरी कर रहा है। पूरे 40 लाख का पैकेज है।

ऐसे ही कई जुमले हमारे बच्चे दिन रात, हजारों बार सुनते हैं। बार-बार। लगातार।

क्या फर्क है मोटिवेशन, उदाहरण, मिसाल और तुलना में-

इन चारों Expressions का कुछ यूं इस्तेमाल किया जा सकता है -

बेटा/बेटी। तुम्हारें अंदर ढेरों काबिलियत हैं। बस इनमें से उस एक को पहचानो जिसमें तुम Best हो। उसे इतने आगे ले जाओ कि वो तुम्हारा पैशन Passion बन सके। याद रखना Passion ही अगर Profession बने तो कामयाबी कभी दूर नहीं रहती। रही बात Motivation की, तो इसके लिए हम हमेशा तुम्हारे साथ हैं।
बेटा/बेटी। एक फिल्म में हिरोइन रही मयूरी कांगो ने आज (5 April 19) Acting छोड़ने के 15 साल बाद Google India में एक हायर पोस्ट पर ज्वाइन किया है। यह इस बात का अच्छा उदाहरण है कि अगर आप अपनी पढ़ाई या Knowledge Gaining जारी रखते हैं तो आपकी Achievements कभी आपको निराश नहीं करती।
बेटा/बेटी। सचिन, गीता-बबीता, आलिया, रणबीर, दीपिका... सब अपने-अपने field की मिसालें हैं। अपना Talent पहचानो और उसे Professionally Deal करो। 
बेटा/बेटी। आखिर तुम करना क्या चाहते हो? जरा अपने आस-पास देखो। तुम्हारे कितने ही दोस्त नौकरी करके अच्छा खासा कमा रहे हैं। तुम हो कि कुछ Decide ही नहीं करते। जरा गुप्ताजी के लड़के को देखो...

बस यही सारा फर्क है। समझने और समझाने की बात है। एक ही Request...पहले समझिए फिर समझाइए।





बच्चों का स्कूल चुनने जा रहे हैं... तो स्कूल चुनिए दुकान नहीं, उसे चुनिए जो उनकी जीत-हार, दोनों की जिम्मेदारी ले... और ऐसा कोई स्कूल है ही नहीं.

जरा इन दिनों अखबार में आ रहे स्कूलों के विज्ञापन और Pamphlets पर गौर कीजिए। Toppers की Photos से भरे पड़े हैं। लेकिन कोई उनकी तस्वीर न...