Thursday, 7 March 2019

हममें से ज्यादातर के लिए सफलता के मायने Materialism यानि भौतिकता में छिपे हैं

सफलता... जब वस्तुओं या संसाधनों से आंकी जाए उसके मायने बहुत छोटे हो जाते हैं।


और ये आंकलन भी अगर सिर्फ रुपए पैसे, संसाधनों या दुनियावी तरक्की से होने लग जाए तो बेड़ा गर्क।

तो और क्या पैमाने होने चाहिए सफलता के? ये कोई और नहीं बताएगा। बता ही नहीं सकता।



फिर एक आसान सा Test. मेरी नजर में यहां सफलता का पैमाना बहुत सीधा है। बहुत ही सरल। कि अगर कोई नौजवान अपने Profession के लिए अपने Office  जाते वक्त भी उतना ही खुश महसूस करता हो, जितना वो घर लौटते वक्त होता है, तो समझ लीजिए कि वो Professionally Successful है। लेकिन ऐसे विरले बहुत कम ही होते हैं।

दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित Business Newspapers में से एक THE ECONOMIC TIMES के मई 2018 में छपे एक News Article के अनुसार देश में केवल 20 फीसदी लोग अपने Job से संतुष्ट हैं।

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अब सवाल उठेगा कि इस तथ्य Fact का पैरेंटिंग से क्या वास्ता? बिल्कुल सीधा वास्ता है। असल में अगर इस Fact की गहराई में जाएंगे तो हमें पता चलेगा कि इन 80% असंतुष्ट लोगों ने करिअर की शुरुआत अपने पसंदीदा या Favorite काम से नहीं की। उन्हें नौकरी Job चुनी, Career नहीं। नतीजा, उनके पास नौकरी, घर, गाड़ी या बैंक बैंलेंस तो है, पर जॉब सेटिस्फेक्शन नहीं।

यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यह जॉब जो उन्होंने चुनी वो उनपर करीब-करीब थोंपी गई होगी।

अब तुम 10वीं कर चुके हो। इंजीनियरिंग कर लो। इंजीनियरिंग कर ली है। अब किसी अच्छी कंपनी में जॉब कर लो। जाॅब मिल गई है, प्रमोशन पर फोकस करो। प्रमोशन हो गया है, अब शादी करके सेटल हो जाओ। बस... यही निर्देश मिलते चले गए और एक मशीन की तरह बच्चा उन्हें Follow करता चला गया।

नौकरी के 10-15 साल बीत जाने के बाद उसे पता चला कि अरे... ये मैं कहां आ गया? मेरे अंदर तो एक Writer था, एक Musician, Actor, Director, Dancer, Scientist, या Journalist था। जो कहीं पीछे छूट गया। और यहीं से शुरू होता है जॉब से अनसेटिस्फेक्शन।

और दुर्भाग्य तो यह है कि देश के युवाओं का एक बड़ा प्रतिशत तो जॉब तक भी नहीं पहुंच पाता क्योंकि उनपर पल-पल मंडरा रहा प्रेशर उन्हें इतना कमजोर कर देता है कि वो हजारों लाखों स्किल्ड लोगों के बीच से अपना रस्ता नहीं बना पाते।

और यकीन मानिए... हमारे बच्चों को कोई काम प्रेशर केवल तब ही लगता है जब वो उसे पसंद नहीं होता। यानि दिल में अगर A R Rahman के तरानों की Composition गूंज रहीं हों और रटने पड़ें Chemistry के Formulas तो इसे प्रेशर ही कहेंगे।

इसलिए बच्चों को वो करने दीजिए जो वो दिल से करना चाहते हैं। फिर उन्हीं से पूछिए कि क्या उनके पसंदीदा काम में ही वो अपना आगे का रास्ता बना सकते हैं?

क्योंकि वो दिन कबके लद चुके हैं जब गिने चुने 5-6 प्रकार के ही कैरिअस ऑप्शंस हुआ करते थे। आज तो अगर किसी को अच्छे जोक्स सुनाने भी आते हैं, तो उसमें भी Career बना सकता है। बशर्ते वो दिल से जोक्स सुनाए। स्पोटर्स, डिजिटल मार्केटिंग, कंप्यूटिंग, लॉ, कॉरपोरेट आदि-आदि न जाने कितनी ऐसी Streams हैं जिन्होंने Career के अनंत अवसर पैदा किए हैं। और आपके बच्चे के पास चुनने के लिए एक पूरी Range है।


सफलता और आत्मसंतोष के बारे बात... अगली पोस्ट में.

2 comments:

बच्चों का स्कूल चुनने जा रहे हैं... तो स्कूल चुनिए दुकान नहीं, उसे चुनिए जो उनकी जीत-हार, दोनों की जिम्मेदारी ले... और ऐसा कोई स्कूल है ही नहीं.

जरा इन दिनों अखबार में आ रहे स्कूलों के विज्ञापन और Pamphlets पर गौर कीजिए। Toppers की Photos से भरे पड़े हैं। लेकिन कोई उनकी तस्वीर न...