Saturday, 16 March 2019

8 से 15 की उम्र : वो Phase जो तय करेगी कि बच्चों के साथ आपकी पूरी जिंदगी कैसी होगी। मजबूत बांडिंग, खूबसूरत रिश्ता या तनाव, दूरियां।

8 साल से पहले तब हर बच्चे की नजर में उसके पिता उसके Super Hero होते हैं और मां सुपर वुमन। अब आगे आपको तय करना है कि यह इमेज बनी रहेगी या नहीं।

इस उम्र में बच्चों को चाहिए जवाब। उनके दिमाग में चल रहे हजारों-हजार सवालों के जवाब। जिज्ञासा के हर रंग के जवाब। वे दुनिया को समझ रहे हैं और इसमें उन्हें आपकी मदद चाहिए।

यकीन मानिए, इस समय अगर आप उनकी जिज्ञासा शांत करने की बजाय उसे डांट डपट कर दबा देते हैं तो आप अपने बच्चों के प्रति अपराध कर रहे हैं। 

एक मनोवैज्ञानिक तथ्य - बच्चे तो अपने सवालों-जिज्ञासाओं के जवाब चाहेंगे और उन्हें खोजेंगे। अच्छा ये होगा कि आप उनकी मदद करें। वरना अगर वे गलत व्यक्ति या माध्यम से अपने जवाब पूछने लगे तो दो बातें होंगी-

पहली - बच्चों का आपसे संवाद कम होने लगेगा। वे मानने लगेंगे कि आपके पास उनके जवाब नहीं हैं।
दूसरी -  दूसरे माध्यमों जैसे इंटरनेट, फ्रेंड्स सर्किल, सोशल मीडिया की ओर झुकाव बढ़ने लगेगा।




यहीं से शुरू होती है उनकी जिंदगी में मोबाइल, सोशल मीडिया, दोस्तों आदि-आदि की भूमिका। और बाद में हम ही शिकायत करते हैं - बच्चे मोबाइल नहीं छोड़ते। असल में ये मोबाइल हमने ही इन्हें थमाया है। 

खुद को बच्चों के अनुसार update रखिए। Google, Wikipedia, Youtube की आदत डालिए

मुझे उनके हर सवाल का जवाब पता हो, यह जरूरी तो नहीं। 

बिल्कुल सही है। आप सर्वज्ञाता नहीं हैं। लेकिन एक बात मान लीजिए। आपको भले ही यह न पता हो। लेकिन आपको यह पता होना चाहिए कि जवाब मिलेगा कहां? यहीं से आपकी Technical Knowledge उनके काम आएगी। और अगर आप ज्यादा Techno Savvy नहीं हैं तो आदत डाल लीजिए। 

तकनीक के मामले में आपकी अपडेशन आपके भी काम आएगी और आपके बच्चों के भी। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज यह कि आपको पता रहेगा कि बच्चे क्या कर रहे हैं। 

इंटरनेट पर सवालों के जवाब तो होते हैं लेकिन उन जवाबों में जवाब देने का अपना Version यानी सोच भी शामिल रहती है। यानी उदाहरण के लिए हिटलर कौन था? सवाल का जवाब खोजते खोजते बच्चे को यह भी जबरदस्ती बताया जाने लगता है कि हिटलर अच्छा था या बुरा। ऐसे में वो बिना सोचे समझे किसी Person, Incident, Accident, Issue के बारे में अपनी सोच बनाने लगता है। 

अगर आप उसके लिए जवाब खोज रहे हैं तो याद रखिए कि बच्चे को जवाब देते समय सिर्फ सच बताइए। अपना Opinion जवाब में लपेटने की कोशिश बिल्कुल न करें। उसे सच बताइए और खुद तय करने दीजिए कि सही क्या और गलत क्या।

जितना हो सके उनके सवाल सुनिए, जवाब दीजिए। प्रेम और अपनेपन भरे आलिंगन से उन्हें बताइए की आप उनके साथ हैं। उनकी छोटी-बड़ी कामयाबी पर उन्हें शाबासी और बधाई दीजिए। आफिस से घर आते ही उन्हें हग करने की आदत डालिए। इससे आपको भी खुशी मिलेगी और उन्हें भी।

एक जरूरी डिस्क्लेमर - यहां मैं सवाल-जवाब की तलाश के बारे में किताबों और लाइब्रेरी का जिक्र नहीं कर रहा हूं। क्योंकि मैं जानता हूं कि सामान्यत: Library या Books अब हमारी जिंदगी का हिस्सा नहीं रही हैं। Mobile और Internet ने इनकी जगह ले ली है। इसलिए बात वही जो प्रयोगिक हो।

8 साल तक के बच्चों के साथ Time Management के बारे में पिछली पोस्ट पर जाने के लिए यहां क्लिक करें

1 comment:

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