Sunday, 31 March 2019

नोट्स बनाते-बनाते थक चुके बच्चों के हाथ अब सुसाइड नोट बनाने लगे हैं... जरा संभल जाइए

भारत में हर घंटे एक छात्र आत्महत्या Sucide कर रहा है। और Sucide Attempt यानी आत्महत्या के प्रयास करने वालों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। 15 से 29 की उम्र में आत्महत्या करने वालों के मामले में भारत दुनिया के टॉप 10 देशों में आता है। आंकड़े National Crime Record Bureau (NCRB) के 2015 के सर्वे के हैं। 

और भी चौंकाने वाले आंकड़ों के लिए यहां क्लिक करें।

दोस्तों, जोधपुर की यह खबर आपके सामने है। महज 7वीं क्लास में पढ़ने वाला छात्र आत्महत्या के बारे में सोच रहा है। एक बेटी अपने पिता को सुसाइड नोट में लिख रही है - पापा, आपने मम्मी से शादी ही क्यों की? मम्मी जानना भी नहीं चाहती कि मैं क्या करना चाहती हूं। वो तो बस मुझे डॉक्टर बनाना चाहती है। चाहे मैं बनना चाहूं या नहीं।


जरा गौर कीजिए। कहीं यही वह प्रेशर तो नहीं, जो नोट्स बनाते-बनाते बच्चों को सुसाइड नोट बनाने पर मजबूर कर देता है। मां-बाप होने के नाते आपको बच्चों से ज्यादा प्यार उनकी परफार्मेंस Performance से कैसे हो सकता है।

ये हैं वे कारण जिनके रहते हम बच्चों पर बेस्ट से बेस्ट Performance का दबाव बनाते हैं-

मनोवैज्ञानिक और समाज शास्त्रियों ने इस बारे में बहुत सी रिसर्च की हैं। वे जानने में लगे हैं कि आखिर मां-बाप अपने बच्चों पर उसकी पसंद-नापसंद जाने बिना पढ़ने या Carrer चुनने का दबाव क्यों बनाते हैं? रिसर्च के नतीजे बहुत सरल भाषा में आपसे शेयर कर रहा हूं-

1. सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग: 
ये आपने कई बार सुना होगा। लेकिन ये है सौ फीसदी सच। Researchers की मानें तो बच्चों को लेकर मां-बाप के 10 से 8 फैसले पूरी तरह लोग क्या कहेंगे के जुमले पर आधारित होते हैं।
  • 10वीं में अच्छे नंबर नहीं आए तो Arts लेनी पड़ेगी। लोग क्या कहेंगे?
  • Music Teacher, Drawing Teacher या Sports Teacher बन गया तो लोग क्या कहेंगे?
  • खुद तो अच्छे नंबर ला नहीं पाया। हम भी अगर Motivate न करें तो लोग क्या कहेंगे?
ये वो सबसे Popular जुमले हैं जो किशोर बच्चों के साथ मां-बाप के Discussion में अक्सर सुनने में आते हैं।

कोई मुझे बताए अगर बच्चा लेना ही Arts चाहता है तो 10वीं के नंबर इसमें क्या करेंगे? कोई बच्चा Music, Sports या Drawing Teacher में ही अपना हीरो देखता है तो आपको क्या परेशानी है? अगर बच्चा अच्छे नंबर नहीं ला सकता या नहीं ला रहा तो आप Motivate करके क्या कर लेंगे? आज नहीं तो कल, उसे अपनी जिंदगी खुद ही तय करनी है। आप कहां तक उसे अंगुली पकड़कर चलाते रहेंगे?

2. क्या कमाएगा? नौकरी कैसे मिलेगी? जिंदगी भर क्या करेगा?
मां-बाप की सबसे बड़ी चिंता। बच्चा सैटल कैसे होगा? क्या कमाएगा? नौकरी कैसे मिलेगी?
जरा सोचिए। क्या यह सच में आपकी जिम्मेदारी है? क्या आपने संतान पैदा की है या स्लीपवेल का गद्दा बनाया है जिसकी 25 साल की गारंटी आपको पूरी दुनिया को देनी है। 

उसके आज का सत्यानाश करके आप उसके कल को बेहतर बनाने पर तुले है। क्या आप स्टांप पेपर पर लिखकर दे सकते हैं कि अगर वो आपकी Planning के हिसाब से चला तो जिंदगी भर अच्छा ही करता रहेगा? इस हिसाब से तो दुनिया के किसी भी कथित कामयाब मां-बाप के बच्चे को नाकामयाब होना ही नहीं चाहिए था।

लेकिन हमारे सामने तो हजारों-हजार ऐसे उदाहरण हैं जिनमें बड़े-बड़े Businessmen, Political Leaders, Bureaurocrates के बच्चे अपनी Legacy कायम नहीं रख पाए।

असल में हमारा ध्यान इस बात पर बिल्कुल नहीं है कि आखिर एक मां-बाप होने के नाते हमें क्या करना है। हम में से ज्यादातर तो रस्म अदायगी के नाम पर बच्चों का पालन-पोषण करते हैं। हमें वास्तव में क्या करना चाहिए, इसके बारे में जल्द ही बात होगी।

3. दुनिया के आधे से ज्यादा बच्चों की जिंदगी केवल एक शब्द ने खराब कर दी है। वो है तुलना। 
क्योंकि ये बहुत बड़ा और व्यापक असर वाला विषय है, इसकी बात अगली पोस्ट में।

Thursday, 21 March 2019

क्या अक्षय कुमार, फराह खान या ऐश्वर्या राय ही पेरेंटिंग पर बात कर सकते हैं? आप या मैं नहीं?

हमारे यहां कही गई बात से ज्यादा कहने वाले चेहरे की कद्र होती है। बात तब बड़ी हो जाती है जब उसे कहने वाला भी बड़ा हो। इसके उलट अगर कोई साधारण आदमी कितनी भी बड़ी बात कहे, वह साधारण ही रहती है।



दोस्तों Parenting पर बात करते करते एक सवाल सामने आया। किसने पूछा, जरूरी नहीं। जरूरी है सवाल- कि आप किस हैसियत से पेरेंटिंग पर लिखते हैं? क्या आप कोई Doctor, Physologist, Celebrity, Socialist या Researcher हैं?

जी नहीं. मैं इनमें से कोई नहीं हूं। लेकिन मैं दो बच्चों का पिता हूं। बड़ी बेटी जो 10th में है बेटा 6th में। बेटी ने कई साल पहले जब पहली बार पूछा कि पापा आप आपकी उम्र कितनी है? तो मेरा जवाब था- बेटी तुम्हारे पापा कि उम्र ठीक तुम जितनी ही है। वो खिलखिलाकर हंस पड़ी। बोली बताओ न पापा... मैंने फिर कहा- हां बेटा... मेरी उम्र ठीक तुम्हारे बराबर है।

वो बोली- कैसे? मैंने कहा- मैं पापा ठीक उसी पल बना था जब तुम पैदा हुई थी। उससे पहले मैं सिर्फ एक शादीशुदा नौजवान था। जैसे ही तुम मेरी गोद में आई... मैं पापा बन गया। हो गई न तुम्हारी और तुम्हारे पापा की उम्र बराबर।

इस लिहाज से मेरा Parenting Experience भी कुल जमा 16 साल का ही है। हां, 10 की उम्र में मैं मामा बन गया था और तीन भांजों को आंख खोलने से आज युवा होते देखने का बहुत ही खूबसूरत अनुभव भी मेरी कीमती जमा पूंजी है।

अब मूल बात Main Topic पर लौटते हैं। क्या सिर्फ Celebrities, Researchers, या So-Called Successful लोग ही Parenting पर बात कर सकते हैं? हम या आप नहीं? मेरे ख्याल से ऐसा बिल्कुल नहीं है।

मैं ऐसे बहुत से माता-पिता को Personally जानता हूं जो मां-बाप होने की सारी कही-अनकही शर्तें बखूबी पूरी करते हैं। वे अपने बच्चों के फेवरेट हैं, उनके बच्चे भी Numbers की Rat Race या Success की गढ़ी-गढ़ाई परिभाषाओं के साथ-साथ अच्छी संतान होने के सारे फर्ज पूरे करते हैं। क्यों ऐसे Parents को हम कामयाब  मानकर उनकी सलाह या अनुभव नहीं ले सकते।

जरा गौर फरमाइए- 

एक मां जिसने ठान ली कि शिशुओं को एलोपेथी की दवाएं नहीं देगी। इस मां ने अपने बच्चों की छुटपुट बीमारियों के इलाज के लिए पहले होम्योपैथी की स्टडी की और फिर खुद दवा बनाकर अपने बच्चों को दी।

एक पिता जिसने Night Shift करते हुए भी अपने बच्चे की Race की तैयारी के लिए ऐसा Time Table बनाया जिसमें उसे खुद सोने के लिए 3 या 4 घंटे ही मिल पाते। लेकिन बेटा Race जीता। 

माता-पिता जिन्होंने बेटी के CBSE Board के दसवीं की परीक्षा के लिए अपना पूरा फोकस इस बात पर किया कि कैसे वे बिना कोई Pressure बनाए अपनी बेटी को अच्छे Marks लाने में मदद करेंगे। हंसते-खेलते पढ़ने और जितना टाइम बेटी पढ़ेगी, उसके आधे टाइम तक उसे खेलने देने के नायाब Formulas भी इस दंपत्ति ने इजाद किए। 

ये सभी लोग एक मुकम्मल परिचय के साथ मेरे आस-पास मौजूद हैं। मैं यहां नाम या पहचान इसलिए नहीं बता रहा क्योंकि नाम लेने से हम इमेजेज बनाने लगते हैं और पूरी बात एक अलग दिशा में चली जाती है।

मेरी नजर में ये सारे मां-बाप पूरी तरह से किसी Celebrity की तरह सुने और पढ़े जाने के हकदार हैं। इन्होंने बच्चों को अपनी एक अलग सोच के साथ आगे बढ़ने का मौका दिया है। और मेरी नजर में सबसे बड़ी बात कि इनकी अपने बच्चों के साथ Bonding बहुत गजब की है।

यह पाठकों पर निर्भर करता है कि इन्हें कामयाबी का तमगा दिया जाएगा या नहीं? क्योंकि मेरी नजर में Success या कामयाबी के अलग मायने हैं। लेकिन एक गुजारिश जरूर है, अगर कोई कुछ अच्छा करता है, तो उसे बिना किसी Tag या नाम के स्वीकार किया जाना चाहिए। चाहे वे Parenting पर बात करते साधारण लोग हों या Celebrities, अच्छी बात सबकी स्वीकार्य होनी चाहिए।

Saturday, 16 March 2019

8 से 15 की उम्र : वो Phase जो तय करेगी कि बच्चों के साथ आपकी पूरी जिंदगी कैसी होगी। मजबूत बांडिंग, खूबसूरत रिश्ता या तनाव, दूरियां।

8 साल से पहले तब हर बच्चे की नजर में उसके पिता उसके Super Hero होते हैं और मां सुपर वुमन। अब आगे आपको तय करना है कि यह इमेज बनी रहेगी या नहीं।

इस उम्र में बच्चों को चाहिए जवाब। उनके दिमाग में चल रहे हजारों-हजार सवालों के जवाब। जिज्ञासा के हर रंग के जवाब। वे दुनिया को समझ रहे हैं और इसमें उन्हें आपकी मदद चाहिए।

यकीन मानिए, इस समय अगर आप उनकी जिज्ञासा शांत करने की बजाय उसे डांट डपट कर दबा देते हैं तो आप अपने बच्चों के प्रति अपराध कर रहे हैं। 

एक मनोवैज्ञानिक तथ्य - बच्चे तो अपने सवालों-जिज्ञासाओं के जवाब चाहेंगे और उन्हें खोजेंगे। अच्छा ये होगा कि आप उनकी मदद करें। वरना अगर वे गलत व्यक्ति या माध्यम से अपने जवाब पूछने लगे तो दो बातें होंगी-

पहली - बच्चों का आपसे संवाद कम होने लगेगा। वे मानने लगेंगे कि आपके पास उनके जवाब नहीं हैं।
दूसरी -  दूसरे माध्यमों जैसे इंटरनेट, फ्रेंड्स सर्किल, सोशल मीडिया की ओर झुकाव बढ़ने लगेगा।




यहीं से शुरू होती है उनकी जिंदगी में मोबाइल, सोशल मीडिया, दोस्तों आदि-आदि की भूमिका। और बाद में हम ही शिकायत करते हैं - बच्चे मोबाइल नहीं छोड़ते। असल में ये मोबाइल हमने ही इन्हें थमाया है। 

खुद को बच्चों के अनुसार update रखिए। Google, Wikipedia, Youtube की आदत डालिए

मुझे उनके हर सवाल का जवाब पता हो, यह जरूरी तो नहीं। 

बिल्कुल सही है। आप सर्वज्ञाता नहीं हैं। लेकिन एक बात मान लीजिए। आपको भले ही यह न पता हो। लेकिन आपको यह पता होना चाहिए कि जवाब मिलेगा कहां? यहीं से आपकी Technical Knowledge उनके काम आएगी। और अगर आप ज्यादा Techno Savvy नहीं हैं तो आदत डाल लीजिए। 

तकनीक के मामले में आपकी अपडेशन आपके भी काम आएगी और आपके बच्चों के भी। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण चीज यह कि आपको पता रहेगा कि बच्चे क्या कर रहे हैं। 

इंटरनेट पर सवालों के जवाब तो होते हैं लेकिन उन जवाबों में जवाब देने का अपना Version यानी सोच भी शामिल रहती है। यानी उदाहरण के लिए हिटलर कौन था? सवाल का जवाब खोजते खोजते बच्चे को यह भी जबरदस्ती बताया जाने लगता है कि हिटलर अच्छा था या बुरा। ऐसे में वो बिना सोचे समझे किसी Person, Incident, Accident, Issue के बारे में अपनी सोच बनाने लगता है। 

अगर आप उसके लिए जवाब खोज रहे हैं तो याद रखिए कि बच्चे को जवाब देते समय सिर्फ सच बताइए। अपना Opinion जवाब में लपेटने की कोशिश बिल्कुल न करें। उसे सच बताइए और खुद तय करने दीजिए कि सही क्या और गलत क्या।

जितना हो सके उनके सवाल सुनिए, जवाब दीजिए। प्रेम और अपनेपन भरे आलिंगन से उन्हें बताइए की आप उनके साथ हैं। उनकी छोटी-बड़ी कामयाबी पर उन्हें शाबासी और बधाई दीजिए। आफिस से घर आते ही उन्हें हग करने की आदत डालिए। इससे आपको भी खुशी मिलेगी और उन्हें भी।

एक जरूरी डिस्क्लेमर - यहां मैं सवाल-जवाब की तलाश के बारे में किताबों और लाइब्रेरी का जिक्र नहीं कर रहा हूं। क्योंकि मैं जानता हूं कि सामान्यत: Library या Books अब हमारी जिंदगी का हिस्सा नहीं रही हैं। Mobile और Internet ने इनकी जगह ले ली है। इसलिए बात वही जो प्रयोगिक हो।

8 साल तक के बच्चों के साथ Time Management के बारे में पिछली पोस्ट पर जाने के लिए यहां क्लिक करें

Tuesday, 12 March 2019

हर उम्र के बच्चों के साथ समय बिताने का अलग होता है तरीका... बस समझिए और अपनाइए...

पिछली पोस्ट में बात निकली थी कि बच्चों को समझने के लिए उनके साथ समय बिताना पहली और अनिवार्य शर्त है।

परिवार के संबंध में समय प्रबंधन Time Management के बारे में शुरू से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

इसी शर्त को थोड़ा और Easy बनाते हैं।

परिवार के लिए समय निकालना शायद बहुत ही आसान है। क्योंकि यहां ना तो कोई 10 से 5 की हाजिरी लगनी है, ना कोई अन्य डेडलाइन है। परिवार में क्योंकि कोई औपचारिकता Formality नहीं होती, इसलिए आप जब चाहें घुलमिल सकते हैं। असल में आपका परिवार के साथ बिताया एक-एक लम्हा आपको रिचार्ज करता है। 

जरा इस ग्राफिक पर गौर कीजिए-

Age & Treatment with Kids.
दिन का कोई न कोई ऐसा समय जरूर होता है जब पूरा परिवार अमूमन घर पर हो। सुबह की चाय, नाश्ता, लंच या डिनर। बस कोशिश कीजिए की उस समय आप सब के साथ हों। सबसे बात कीजिए। याद रखिए महत्वपूर्ण ये नहीं है कि आपने कितना समय परिवार के साथ बिताया। महत्वपूर्ण है कि वो समय आपने कैसे बिताया।

आपकी अपने परिवार से संवाद में आ रही कमी खत्म करने में फोन भी बहुत कारगर हो सकता है। खाली समय में पत्नी को फोन करके बताइए कि आज वो पिंक साड़ी में बहुत खूबसूरत लग रही थी। या बेटा या बेटी से बात करते हुए उन्हें कहिए कि आप उन्हें ऑफिस में भी याद करते रहते हैं। उन्हें भी अच्छा लगेगा और संवादहीनता की स्थिति भी नहीं रहेगी।

शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो अपने बच्चों के साथ समय न बिताना चाहे। बस उन्हें समझना का अपना नजरिया बदलिए। 

दो से आठ वर्ष के बच्चे

इनके लिए आपकी उपस्थिति फीजिकल होनी बहुत जरूरी है। इस उम्र में पास होने का मतलब ही खेलना, मस्ती करना, साथ में उठापटक करना होता है। यहां न संवाद जरूरी है, ना गंभीरता। और हां। एक और खासियत। बच्चों को समय की मात्रा से कोई मतलब होता ही नहीं। उन्हें तो बस चाहिए आपका साथ।

एक छोटा सा प्रयोग करके देखिए- एक नियम बना लीजिए की स्कूल से लौटते ही अपने बेटे या बेटी को पूरे प्यार और दुलार के साथ हग Hug करेंगे। कुछ ऐसे की उसे लगे कि मेरी मम्मी या पापा तो घंटों से मेरा ही इंतजार कर रहे थे। यकीन मानिए... यह छोटा सा प्रयोग उसे आपके इतने करीब लाएगा कि सोच भी नहीं सकते। और अगर इसे आप अपनी आदत बना लें, तो ताउम्र ये बच्चे आपसे दूर नहीं होंगे। 

इसके बाद उसके पूरे स्कूल टाइम के बारे में पूछिए। बहुत ही फनी तरीके से। यानी कुछ ऐसे - अरे.... आज तो आपके कान बिल्कुल लाल हैं। लगता है पनिशमेंट मिली है। 

या मेरा बच्चा बहुत थका सा लग रहा है। लगता है आज खूब पढ़ाई की। 
या ओके... फर्स्ट पीरियड से स्टार्ट करते हैं... बताओ क्या क्या हुआ आज स्कूल में?

इस तरह बच्चा न सिर्फ आपको अपने करीब पाएगा, बल्कि ये बताते-बताते वो अपने दोस्तों, टीचर्स, स्कूल के माहौल आदि सबके बारे में बात करेगा। यानी आप हंसते खेलते यह जान भी पाएंगे कि बच्चा स्कूल में क्या कर रहा है और उसके साथ समय भी बिता पाएंगे। 

और मजे की बात यह है कि ये सारी बात आप अपने बच्चे से फोन पर भी कर सकते हैं। केवल 5 या 7 मिनट में। उसके लिए इतना काफी है। 

आठ साल से बड़े बच्चों के साथ कैसे बिताएं समय? अगली पोस्ट में

Sunday, 10 March 2019

Parenting के पहले सूत्र से शुरू करते हैं.... जो है- बच्चों के साथ समय बिताइए।

अच्छे मां-बाप होने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी और पहला सूत्र क्या हो सकता है? 

अरे भई यह तो बहुत व्यापक है। यानी हर बच्चे, हर मां-बाप के लिए अलग-अलग।

तो आपको कैसे पता चलेगा कि मेरे केस में Best Parenting के मायने क्या है?


बहुत आसान है। आपके बच्चों को आपसे बेहतर कौन समझ सकता है। तो उन्हें समझिए। उसके बाद ही तो पता चलेगा कि आपके पास क्या तरीका है Better या The Best पेरेंट होने का।


लेकिन बच्चों को समझें कैसे?

Parenting, Time Management. 

फिर बहुत आसान है। उनके साथ समय बिताइए। उन्हें वक्त दीजिए। ज्यादा से ज्यादा नहीं... बेहतर से बेस्ट टाइम। Quantity of Time नहीं Quality of Time.

अरे यही तो सबसे बड़ी समस्या है। टाइम कहां है बच्चों के लिए? भागदौड़ भरी जिंदगी। घर, ऑफिस, ट्रैफिक, स्ट्रेस आदि आदि। टाइम कैसे निकालें?
एक बच्चे के पिता के साथ संवाद की हजारों बार दोहराई जा चुकी कहानी। वही... पापा आप एक घंटे में कितना कमा लेते हो। प्लीज कल एक घंटा मेरे साथ बिताना। वगैरा-वगैरा....

कृपया इस तरह का इमोशनल अत्याचार मत कीजिए। ये कहानी दर्जनों बार पढ़ चुका हूं और मुझे नहीं लगता इसमें जरा सी सच्चाई है।
प्रिय दोस्तों... आपसे निवेदन है कि प्लीज टाइम की कमी को मत कोसिए। असल में कमीटाइम मैनेजमेंट की है। क्योंकि दुनिया के सबसे व्यस्त व्यक्ति से लेकर निपट ढाले बैठे किसी आदमी तक सबको दिन में 24 घंटे ही मिले हैं। समस्या यह है कि आप इन घंटों का मैनेजमैंट कैसे करते हैं।
सच कहूं अगर आपकी संतान भी इस कहानी के बच्चे की तरह आपसे आपका एक घंटा खरीदने निकली है तो धिक्कार है।


सुबह-सुबह उठकर केवल 15 मिनट बच्चों को लेकर अपने घर के निकटतम पार्क में चले जाइए। आपका और बच्चों का दिन बेहतरीन हो जाएगा। बच्चे कभी भी समय की मात्रा पर ध्यान नहीं देते।

प्रयोग करके देखिए... केवल तीस सेकंड में नींद से जागा बच्चा तुरंत खेलने के लिए तैयार हो जाएगा और अगले तीस सेकंड में वो आपके साथ खेलने भी लगेगा। अगर बच्चे बड़े हैं तो उन्हें बस आपका ध्यान चाहिए।

खाने के समय, तैयार होते समय या किसी भी समय बस उससे बात भर कर लीजिए। रोज ... लगातार ऐसा कीजिए। वो कभी आपके बिजी होने की शिकायत नहीं करेगा।
डॉ. विजय अग्रवाल जो 12 वर्षों तक राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा के निजी सचिव रहे औरटाइम मैनेजमैंट पर जिनका गहरा अध्ययन है, सौभाग्य से भास्कर पत्रकारिता अकादमी में मेरे बैच के मैंटर थे। उनके दो व्याख्यानों ने टाइम मैनेजमैंट के बारे में बहुत कुछ सिखाया जो यादगार है।

परिवार और बच्चों के संदर्भ में टाइम मैनेजमेंट के बारे में... अगली पोस्ट में

Thursday, 7 March 2019

हममें से ज्यादातर के लिए सफलता के मायने Materialism यानि भौतिकता में छिपे हैं

सफलता... जब वस्तुओं या संसाधनों से आंकी जाए उसके मायने बहुत छोटे हो जाते हैं।


और ये आंकलन भी अगर सिर्फ रुपए पैसे, संसाधनों या दुनियावी तरक्की से होने लग जाए तो बेड़ा गर्क।

तो और क्या पैमाने होने चाहिए सफलता के? ये कोई और नहीं बताएगा। बता ही नहीं सकता।



फिर एक आसान सा Test. मेरी नजर में यहां सफलता का पैमाना बहुत सीधा है। बहुत ही सरल। कि अगर कोई नौजवान अपने Profession के लिए अपने Office  जाते वक्त भी उतना ही खुश महसूस करता हो, जितना वो घर लौटते वक्त होता है, तो समझ लीजिए कि वो Professionally Successful है। लेकिन ऐसे विरले बहुत कम ही होते हैं।

दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित Business Newspapers में से एक THE ECONOMIC TIMES के मई 2018 में छपे एक News Article के अनुसार देश में केवल 20 फीसदी लोग अपने Job से संतुष्ट हैं।

पूरा सर्वे पढ़ने के लिए इस LINK पर क्लिक करें

अब सवाल उठेगा कि इस तथ्य Fact का पैरेंटिंग से क्या वास्ता? बिल्कुल सीधा वास्ता है। असल में अगर इस Fact की गहराई में जाएंगे तो हमें पता चलेगा कि इन 80% असंतुष्ट लोगों ने करिअर की शुरुआत अपने पसंदीदा या Favorite काम से नहीं की। उन्हें नौकरी Job चुनी, Career नहीं। नतीजा, उनके पास नौकरी, घर, गाड़ी या बैंक बैंलेंस तो है, पर जॉब सेटिस्फेक्शन नहीं।

यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यह जॉब जो उन्होंने चुनी वो उनपर करीब-करीब थोंपी गई होगी।

अब तुम 10वीं कर चुके हो। इंजीनियरिंग कर लो। इंजीनियरिंग कर ली है। अब किसी अच्छी कंपनी में जॉब कर लो। जाॅब मिल गई है, प्रमोशन पर फोकस करो। प्रमोशन हो गया है, अब शादी करके सेटल हो जाओ। बस... यही निर्देश मिलते चले गए और एक मशीन की तरह बच्चा उन्हें Follow करता चला गया।

नौकरी के 10-15 साल बीत जाने के बाद उसे पता चला कि अरे... ये मैं कहां आ गया? मेरे अंदर तो एक Writer था, एक Musician, Actor, Director, Dancer, Scientist, या Journalist था। जो कहीं पीछे छूट गया। और यहीं से शुरू होता है जॉब से अनसेटिस्फेक्शन।

और दुर्भाग्य तो यह है कि देश के युवाओं का एक बड़ा प्रतिशत तो जॉब तक भी नहीं पहुंच पाता क्योंकि उनपर पल-पल मंडरा रहा प्रेशर उन्हें इतना कमजोर कर देता है कि वो हजारों लाखों स्किल्ड लोगों के बीच से अपना रस्ता नहीं बना पाते।

और यकीन मानिए... हमारे बच्चों को कोई काम प्रेशर केवल तब ही लगता है जब वो उसे पसंद नहीं होता। यानि दिल में अगर A R Rahman के तरानों की Composition गूंज रहीं हों और रटने पड़ें Chemistry के Formulas तो इसे प्रेशर ही कहेंगे।

इसलिए बच्चों को वो करने दीजिए जो वो दिल से करना चाहते हैं। फिर उन्हीं से पूछिए कि क्या उनके पसंदीदा काम में ही वो अपना आगे का रास्ता बना सकते हैं?

क्योंकि वो दिन कबके लद चुके हैं जब गिने चुने 5-6 प्रकार के ही कैरिअस ऑप्शंस हुआ करते थे। आज तो अगर किसी को अच्छे जोक्स सुनाने भी आते हैं, तो उसमें भी Career बना सकता है। बशर्ते वो दिल से जोक्स सुनाए। स्पोटर्स, डिजिटल मार्केटिंग, कंप्यूटिंग, लॉ, कॉरपोरेट आदि-आदि न जाने कितनी ऐसी Streams हैं जिन्होंने Career के अनंत अवसर पैदा किए हैं। और आपके बच्चे के पास चुनने के लिए एक पूरी Range है।


सफलता और आत्मसंतोष के बारे बात... अगली पोस्ट में.

Monday, 4 March 2019

Success और इससे जुड़ी और बहुत सारी बातें…

Success यानि क्या?

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में Basket Ball के महान कोच रहे जॉन वुडन के अनुसार -  “Success is peace of mind, which is a direct result of self-satisfaction in knowing you made the effort to do your best to become the best that you are capable of becoming.” 

यानि - कामयाबी दिमाग की शांति है, जो आत्मसंतोष से आती है। आत्म संतोष इस बात का कि आपने जो सर्वश्रेष्ठ आप बनना चाहते थे, वो बनने में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। 




यानि कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण हैं कामयाब या Successful होने के लिए। पहली कि सक्सेस का कोई बाहरी पैमाना नहीं है। यह बहुत अंदरूनी चीज है। सिर्फ मैं अपनी पूरी Consciousness यानि एकाग्रता के साथ यह घोषित कर सकता हूं कि मैं कामयाब हूं या नहीं...

मतलब पेरेंटिंग के मामले में इसका सीधा सा मतलब है- आप जो अपने बच्चे को बनाना चाहते हैं, क्या अंदर से आपका बच्चा उसे सक्सेसफुल मानेगा या नहीं? मसलन आपकी नजर में देश का सबसे बड़ा डॉक्टर बनना आपके बच्चे की सफलता है, और वो चाहता है कि वो Music के फील्ड में अपना नाम कमाए। 

अब Efforts तो दोनों में होंगे। आपके उसे डॉक्टर बनाने में भी, और उसके अच्छा Musician बनने में भी। लेकिन डॉक्टर बनाने में आत्मसंतोष नहीं होगा। न आपको, न उसे।

अब जाहिर सा सवाल हो सकता है आपका- अरे भई! एक बच्चे को क्या पता कि क्या बनना उसके लिए सही है। बड़े होकर उसे क्या करना है, यह तो हम ही उसे बताएंगे न। 

बिल्कुल सही. लेकिन एक बात सोचिए। अगर एक बच्चे को नहीं पता कि उसे क्या बनना है तो यह भी तय है कि उसे आप बचपन में कुछ बना भी नहीं सकते। यानि मैंने नहीं सुना कोई 15 साल का डॉक्टर, इंजीनियर या सॉफ्टेवयर डेवलपर (तथागत तुलसी या कौटिल्य जैसे बच्चे अपवाद हैं। ) 

तो अगर उसे बड़ा होने के बाद ही कुछ बनना है तो उसे बड़ा होने तो दीजिए। तब तक आप एक अच्छे मां-बाप की तरह उसकी बेहतर से बेहतर परवरिश कीजिए। बिल्कुल निस्वार्थ, निष्फल भाव से। अगर आपकी परवरिश सही रही तो वो चाहे कुछ भी बने। हमेशा खुद भी खुश रहेगा, आपको भी खुश रखेगा। 

फिर हममें से ज्यादातर के लिए सफलता के मायने Materialism यानि भौतिकता में छिपी है। इसी बारे में बात अगली पोस्ट में... 

Sunday, 3 March 2019

Being Parent... कितना मुश्किल या आसान है मां-बाप होना

Parenting... यानि परवरिश। 

वह दौर जो तय करता है कि आपने जिन बच्चों को सहेज-संभालकर कर बड़ा किया, वो कितने कामयाब Successful हुए। क्या वे पूरी तरह से वो बन पाए जो आप उन्हें बनाना चाहते थे? कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई? 

शायद यही है पैरेंटिंग यानि परवरिश की बरसों पुरानी परिभाषा। बच्चे, जिम्मेदारी, संस्कार, परवरिश, संभालना, सहेजना, उनके बड़े होकर अपने पैरों पर खड़े होने तक की चिंता Bla Bla Bla...

दोस्तों... क्या दुनिया बहुत बदल नहीं गई है? क्या आज भी हमारे सामने Parenting को लेकर वही सदियों पुराने सवाल हैं ? या वक्त ने उन सवालों, उन परिभाषाओं को कुछ सरल किया है?



I Mean सबसे पहले तो यही बात कि Success यानि क्या? आपके लिए और बच्चे के लिए इसके मायने क्या? डॉक्टर का बेटा डॉक्टर बन जाए, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर बन जाए या Businessman का बेटा Businessman बन जाए तो हो गया? हो गए आप सक्सेसफुल पेरेंटस?

ठहरिए सर. अभी बेटियों की तो बात ही नहीं हुई। सालों से उनके लिए तो एक ही बात Success का Parameter मानी जाती रही है, पढ़ लिखकर, शादी करके सेटल हो जाए... बस। कई जगह तो बेटियों की Parenting का पूरा थीम ही उनकी शादी होती है। जैसी बेटियां पैदा ही शादी करने के लिए हुई हों।

Main Topic पर आते हैं। गुगल,  Physiologists या मनोवैज्ञानिकों या डॉक्टरों से हमारा सवाल कि क्या हम अच्छे पेरेंटस हैं? कहीं न कहीं यही बताता है कि परवरिश को लेकर बहुत ज्यादा conscious हैं।  क्या हम बच्चे को सही तरह से पाल रहे हैं? वो आगे चलकर क्या बनेगा, क्या हमने इसकी बहुत अच्छे से तैयारी कर ली है?

अगर बार-बार आप अपने आप से ये सवाल पूछते हैं तो संभल जाइए। आप सचमुच अपने और अपने बच्चे के लिए मुश्किलों को न्यौता दे रहे हैं। क्योंकि मेरा मानना है कि आजकल मां-बाप नहीं, बच्चे यह चुनाव करते हैं कि उन्हें क्या बनना है। वे आपके पास अपने Options लेकर आते हैं और उन्हें बस आपकी रजामंदी और Support चाहिए। इसके बाद अगर बच्चों की जुबान में ही कहें तो take a chill pill Bro...

मेरा मानना है बेस्ट पेरेंटस होने की बड़ी बड़ी परिभाषाओं, Formulas, Parameters से ज्यादा एक छोटी सी बात पर ध्यान दिया जाए। एक छोटा सा टेस्ट... बहुत साधारण सा... जो आप कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं।

क्या... आपके बच्चों को उस वक्त अपने पास बुलाइए जब वो अपना सबसे Favorite काम कर रहा हो। मसलन टीवी देखते वक्त, अपना पसंदीदा Game या Sports खेलते वक्त या अपने दोस्त की  Birthday Party के बीच से। यकीन मानिए... अगर आपका बेटा या बेटी अपने फेवरेट काम को बीच में छोड़कर आपके पास आ सकता है, वो तुरंत रिस्पांस करता है, तो आप सौ टका सही पेरेंट हैं।

इसके पीछे कोई गूढ़ विज्ञान नहीं ब्लकि बहुत सरल सा लगाव है जो आपके बच्चों में आपके लिए मौजूद है। और यकीन मानिए, अगर बचपन से किशोरावस्था की दहलीज पर पांव रख चुके बच्चों में अगर आपके प्रति यह लगाव मौजूद है तो आप सही पेरेंट्स हैं।

Success और इससे जुड़ी और कई सारी बातें... अगली पोस्ट में...

बच्चों का स्कूल चुनने जा रहे हैं... तो स्कूल चुनिए दुकान नहीं, उसे चुनिए जो उनकी जीत-हार, दोनों की जिम्मेदारी ले... और ऐसा कोई स्कूल है ही नहीं.

जरा इन दिनों अखबार में आ रहे स्कूलों के विज्ञापन और Pamphlets पर गौर कीजिए। Toppers की Photos से भरे पड़े हैं। लेकिन कोई उनकी तस्वीर न...